विभूतियोग: कण-कण में ईश्वर का दर्शन | गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा
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इस एपिशोड में हम “अध्यात्मिक प्रबोधन: गीता के 18 योग” की श्रृंखला के अंतर्गत विभूतियोग खंड पर विचार करते हैं, जो भगवद्गीता के दसवें अध्याय पर आधारित है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि वे केवल किसी एक स्थान या रूप में सीमित नहीं हैं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक कण, प्रत्येक जीव और प्रकृति के प्रत्येक तत्व में विद्यमान हैं।
सूर्य की तेजस्विता, नदियों का प्रवाह, हिमालय की स्थिरता और संसार की हर श्रेष्ठता—ये सभी ईश्वर की विभूतियाँ हैं। इन विभूतियों को पहचानना ही अज्ञानता से मुक्ति का मार्ग है। जब साधक यह समझ लेता है कि संसार की प्रत्येक महानता परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है, तब उसकी भक्ति गहरी होती है और उसका दृष्टिकोण व्यापक बनता है।
यह एपिशोड हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के हर अनुभव में ईश्वर की उपस्थिति को पहचानना ही सच्चा विभूति-दर्शन है। यही दृष्टि हमें सांसारिक मोह से ऊपर उठाकर भक्ति, शांति और आंतरिक संतुलन की ओर ले जाती है।
यदि आप गीता के ज्ञान को अपने जीवन में अनुभव करना चाहते हैं और ईश्वर की सर्वव्यापकता को समझने की जिज्ञासा रखते हैं, तो यह चर्चा आपके लिए अत्यंत प्रेरणादायक सिद्ध होगी।