स्थितप्रज्ञ ( अपने आप से अपने आप में ही संतुष्ट ) Podcast Por  arte de portada

स्थितप्रज्ञ ( अपने आप से अपने आप में ही संतुष्ट )

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* भगवत गीता 2 अध्याय का 55 वा श्लोक

* जितनी अधिक इच्छाएं उतनी ही अधिक अशांति

* सार यह निकला मिले हुए कार्य को भगवान का स्मरण करते हुए निष्ठा पूर्वक चेष्टा करते रहें

* जो कुछ अपने से ठीक बन जाए वह माने भगवान की कृपा से ठीक हुआ है और गलत हो जाए तो अपनी कमी से गलत हुआ

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