मैं सोचती हूँ Podcast Por  arte de portada

मैं सोचती हूँ

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मैं सोचती हूँ,
अगर ये इश्क ही ना होता, तो क्या होता?
ये गुलाब, ये खत, ये तस्वीरों की क्या कीमत होती?
ये गुलाब बस एक फूल होता,
ये खत सिर्फ कागज होते,
ये तस्वीरें बेजान होतीं।
मैं सोचती हूँ,
अगर ये इश्क ही ना होता, तो क्या होता?

ना होता बारिशों का इंतज़ार,
ना होता बातों का इकरार,
ना आँखों से बातें होतीं,
ना विरह में बिताई गई वो रातें होतीं।
लाल रंग भी फिर सिर्फ एक रंग होता,
मैं सोचती हूँ,
अगर ये इश्क ही ना होता, तो क्या होता?
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